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प्र यंका जब पहली बार मां बनी, तो उसकी उम्र थी 33 वर्ष। उसकी पहली संतान मंगोल बेबी थी यानी ऐसा बच्चा जिसका मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से विकास बाधित था। दूसरी संतान के समय उसने पहले परामर्श लिया और ट्रिपल टेस्ट की मदद भी।

गर्भावस्था जैसी सुखद और सुकोमल अनुभूति लेने की उम्र अब महानगरों में बीस से बढक़र तीस वर्ष हो गई है। हम बात करेंगे उन महिलाओं की, जो तीस अथवा उसके बाद की उम्र में गर्भधारण करती हैं। मोटे तौर पर यदि लिया जाए तो ऐसी दो स्थितियां होती हैं, जहां गर्भावस्था तीस या उसके बाद हो- –

महिला का विवाह देर से हुआ हो और यह उसका पहला बच्चा हो।
महिला के विवाह को समय हो चुका है।

शायद नि:संतानता के लिए इलाज चल रहा हो जिसके कारण यह उनका पहला बच्चा हो। चाहे स्थिति पहली हो या दूसरी, इतना जान लें कि यह गर्भधारण ‘हाई-रिस्क’ की श्रेणी में आता है यानी अति जोखिम भरा। दरअसल, गर्भधारण के पहले, दौरान और बाद में विलक्षण परिस्थितियां सामने आती हैं, इसीलिए इसे हाई-रिस्क श्रेणी में रखा गया है।

आइए जानते हैं क्यों? गर्भधारण की आदर्श उम्र 23-28 तक की मानी गई है। 23 से पहले का अपरिपक्व शरीर शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार नहीं होता है। 28 के बाद, शरीर और मन दोनों तैयार रहते हैं, परंतु अंडाशय में परिवर्तन आने शुरू हो चुके होते हैं।

जैसे- जैसे उम्र बढ़ती है अंडे का आकार, प्रकार, व्यवहार सभी कुछ बदलना शुरू हो जाता है। अंडे की गुणवत्ता में गिरावट आ जाती है। इस उम्र का गर्भ सामान्य न हो, इसकी आशंका हो जाती है। ऐसा पाया गया है कि उम्र बढऩे पर गर्भस्थ शिशु के मानसिक रूप से अविकसित होने और शारीरिक विकलांगता के लक्षण बढ़ जाते हैं।

मानसिक विकलांगता जिसे डाउंस सिंड्रोम भी कहा जाता है, का खतरा तीस से अधिक उम्र वाली गर्भवती महिलाओं में अत्यधिक प्रतिशत में पाया जाता है। इस अवस्था में पैदा होने वाले शिशु में मानसिक और शारीरिक दोनों समस्याएं होती हैं। आगे जन्म लेने वाला बच्चा डाउंस सिंड्रोम से ग्रसित न हो, इसे जानने के लिए आजकल साधन उपलब्ध हैं।

16 हफ्तों की गर्भावस्था में ‘ट्रिपल टेस्ट’ नामक एक खून की जांच होती है, जो यह दर्शा सकता है कि गर्भस्थ शिशु डाउंस सिंड्रोम से ग्रसित है या नहीं। फिर इस शिशु की सोनोग्राफी, जिसे लेवल सेकंड (दूसरे स्तर की) सोनोग्राफी कहा जाता है, की जाती है। डाउंस सिंड्रोम के लक्षण यदि पाए गए, तो सोनोग्राफी में उसे जांच लिया जाता है।

यह निश्चित होने पर कि गर्भस्थ शिशु सुरक्षित नहीं है, उस दंपति को सब बातें समझाकर गर्भ गिराने की सलाह दी जाती है। यह बड़ी दुखद स्थिति होती है परंतु ऐसे बच्चे को जन्म देने से, जो मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से अविकसित हो, से कहीं अच्छा है कि गर्भपात कराया जाए। ऐसी स्थितियों से बचने के लिए आजकल डॉक्टरी सलाह बहुत कारगर साबित होती है।

इस डॉक्टरी सलाह लेने का सबसे उचित समय है जब आप सिर्फ सोच रहे हों कि अब ‘परिवार बढ़ाना है।’ इस प्रक्रिया को कहते हैं- प्री-कन्सेप्शनल काउंसलिंग। इसमें डॉक्टर आपको गर्भधारण के पूर्व की तैयारी से अवगत कराते हैं और गर्भावस्था के दौरान आने वाली व्यक्ति विशेष की परेशानियां बताते हैं तथा उनके अनुसार सुझाव और समाधान देते हैं।

तीस से अधिक उम्र वाली महिलाओं को यदि पहली बार गर्भधारण करना हो, तो उनके लिए यह अत्यावश्यक है कि वे पहले डॉक्टरी सलाह ले लें।
जिस दिन से आप परिवार में बढ़ोतरी करने के लिए तय करें, उस दिन से फॉलिक एसिड नामक दवा का सेवन आरंभ कर दें- लेकिन डॉक्टरी सलाह के बाद।
यदि आपका विवाह 26/27 की उम्र के आस-पास हुआ हो, तो समय न गंवाते हुए बच्चे के बारे में जल्द से जल्द सोचें। यदि आपका इलाज चल रहा हो तो डॉक्टर स्वयं ही इस बारे में आपका ध्यान रखेंगे कि आप फॉलिक एसिड बराबर लें, ट्रिपल टेस्ट करवाएं। आप सिर्फ सतर्क रहें और डॉक्टर से भरपूर सहयोग करें। अभी बात हुई है सिर्फ डाउंस सिंड्रोम की, लेकिन ऐसी और भी कई तकलीफें उन महिलाओं को आ सकती हैं, जो तीस वर्ष से अधिक उम्र में गर्भधारण कर रही हों, जैसे- –
गर्भपात होना।
ब्लड प्रेशर बढऩा यानी गर्भावस्था के दौरान रक्तचाप का बढऩा। यह बहुत ही खराब स्थिति होती है, जिसका निदान भी कठिन होता है।
आंवल का निचले हिस्से में होना या अपनी जगह से सरकना।
मधुमेह का होना- जो बढ़ती उम्र के साथ गर्भावस्था के दौरान देखी जा सकती है।
बच्चे का वजन में कम होना या गर्भस्थ शिशु की शारीरिक विकास दर का कम होना।
एनीमिया यानी रक्ताल्पता का होना।

यह सब परिस्थितियां, पहले से ही खराब स्थिति को और खराब करने का काम करती हैं। इन सबके साथ होने से जोखिम बढ़ता जाता है, जिसके कारण कई बार अत्यधिक जांचें, सोनोग्राफी, दवाइयां इत्यादि लेनी पड़ सकती हैं। कई बार तो अस्पताल में भी भर्ती करना पड़ सकता है। अब तक हम जि़क्र कर रहे थे उन महिलाओं की, जो तीस या उससे अधिक उम्र में पहली बार मां बनी हों। परंतु एक स्थिति ऐसी भी होती है जब महिला अत्यधिक प्रजनन कर चुकी हो और यह उसका पांचवां, छठा बच्चा हो।

ऐसे में संकट के बादल और गहराते जाते हैं और ऐसी महिलाओं को अत्यधिक डॉक्टरी सलाह और देखरेख की आवश्यकता होती है। प्रसूति पर कुछ शब्द प्राय: बड़ी उम्र में मां बनने वाली महिलाओं को ऑपरेशन द्वारा ही बच्चे प्राप्त होते हैं। हर समय डॉक्टर की गलती नहीं होती।

पहली बात, एक तो परिपक्व शरीर में लचीलापन बरकरार नहीं रहता, जिससे वह जचकी का भार सह सके। या फिर और भी जुड़ी हुई जटिलताएं और परेशानियां होती हैं। जोखिम बढऩे से कई बार सिजेरियन का रास्ता अपनाना पड़ता है। यह आवश्यक नहीं है कि ऑपरेशन ही हो, परंतु अक्सर ऐसा होता जरूर है।

अपने बढ़ते कैरियर के प्रति अति जागरुक महिला यदि तीस- पैंतीस के बाद मां बनती है तो जचकी के बाद का आराम उसके लिए काफी कष्टïदायक बन सकता है। यह वह समय है जब पूर्ण आराम करवाया जाता है। ‘प्रसूति वियोग’ से गुजर रही महिलाओं में डिप्रैशन अधिक देखने में आ रहा है। परंतु यह आंकड़े विकसित देशों और महानगरों तक सीमित हैं। भारतीय नारी आज भी मातृत्व को परम सुख की अनुभूति मानती है, कोई दबाव नहीं।

उम्र कोई भी हो, संतानोत्पत्ति हमारे समाज में हर्ष और उल्लास का विषय है। स्त्री और परिवार की संपूर्णता के लिए संतान का होना आवश्यक है। उम्र के ऐसे कगार पर खड़े होकर संतान के विषय में सोचना कष्टïदायक हो सकता है। प्रकृति के सृजन के कुछ अपने नियम होते हैं।

इन नियमों का पालन करने में ही हमारी भलाई है। यदि किसी कारणवश यह पहला बच्चा हो तो फिर भी ठीक है परंतु यदि जान-बूझकर देेर की गई है, तो यह ठीक निर्णय नहीं कहा जा सकता।

एक सुखद अनुभूति के लिए, सुरम्य रास्ता अपनाएं जिससे आप, आपका आने वाला बच्चा, परिवार, समाज सभी स्वस्थ रहेंगे।

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