How to prove your honesty to your girl

मे रा जन्म ईरान में हुआ था। मैं बहुत छोटी थी, जब मेरी मां मुझे छोडक़र चली गई। मुझे उनके बारे में ज्यादा कुछ याद नहीं है। उस वक्त ईरान में ज्यादा अंधविद्यालय नहीं थे। तब मेरे पिता मुझे मुंबई ले आए। उस समय मेरी उम्र मात्र चार साल थी। उन्होंने मेरा दाखिला वर्ली के हैप्पी होम ब्लाइंड स्कूल में करा दिया। यह एक बोर्डिंग स्कूल भी था।

दाखिले के बाद मेरे पिता भी मुझे वहां छोडक़र चले गए। फिर उनसे कभी नहीं मिली। स्कूल की प्रिंसिपल बनाजी ने एक मां की तरह मेरी देखभाल की। चूंकि हैप्पी होम लडक़ों का स्कूल था, इसलिए मैं वहां ज्यादा समय तक नहीं रह सकती थी। नियमानुसार वहां केवल तीसरी कक्षा तक ही लड़कियां बोर्डिंग में रह सकती थीं।

यह वह जगह थी, जहां बच्चों को आत्मनिर्भर बनना सिखाया जाता था। जब उन्हें लगता कि बच्चा सक्षम हो गया है तब वे उन्हें सामान्य बच्चों के स्कूल में भेज देते थे। मेरी प्रिंसिपल ने जब यह देखा कि मैं भी सामान्य वातावरण में रह सकती हूं तब उन्होंने और उनकी एक सह्रïदय मित्र ने मेरा दाखिला बांद्रा के एक बोर्डिंग स्कूल में करवा दिया।

वे मेरी जिंदगी के सबसे अच्छे दिन थे। मैंने वहां रहकर बहुत कुछ सीखा। उन बच्चों को मेरे साथ घुलने-मिलने में हालांकि कुछ समय लगा, लेकिन उनके आसपास रहने से मुझे सामान्य रहने की बहुत शक्ति मिलती थी। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता कि जो कुछ वे करते हैं, वो मैं क्यों नहीं कर सकती? शुरुआत में मैं बहुत बार गिर पड़ती या टकरा जाती थी।

कुछ मुश्किलों के बाद धीरे- धीरे सबसे मेरी दोस्ती हो गई और वे मेरा ख्याल भी रखने लगे। कुछ समय बाद एक सुखद झोंके की तरह कमल आंटी मेरे जीवन में आईं और जल्द ही मैं उनके परिवार का हिस्सा बन गई। तब मेरे पास ऐसा कोई नहीं था, जो मेरे लिए पढ़ सके और बस इसी तरीके से मैं पढ़ाई कर सकती थी। उस समय ब्रेल लिपि में बहुत कम किताबें थीं, खासकर अंग्रेजी माध्यम की।

जब मेरे जन्म देने मुझे छोडक़र गए, तब मैं बहुत छोटी थी। मुझे जब गोद लिया गया, तो मैंने आंटी को मां कहने से मना कर दिया था। लेकिन एक साल के अंदर मेरी धारणा बदल गई। पहले बुरा गुजरने पर मैं जन्म देने वाली मां को दोष देती थी। लेकिन नई मां ने मुझे बातों के सकारात्मक पहलू को देखना सिखाया…

तब मेरी उम्र 14 वर्ष थी। इस मुश्किल से मुझे कमल आंटी ने उबार लिया। वे मुझे किताबें पढक़र सुनाया करती थीं। फिर वे मुझे सप्ताहांत और छुट्टिïयों में उनके घर ले जाने लगीं। डायना और पेरि$जाद उनकी दो बेटियां थीं। पेरि$जाद को उन्होंने गोद लिया था। एक साल बाद आंटी ने मुझे भी गोद लेने का निर्णय ले लिया। जिस उम्र में मैं थी उस वक्त सब अपने माता-पिता के बारे में बात करते हैं।

आपको भी लगता है कोई हो जिसे आप अपना कह सकें। और इस तरह मैं भी इस परिवार का हिस्सा बन गई। अब दो प्यारी बहनों के साथ मेरा भी परिवार था। लेकिन सच कहूं, शुरुआत में वहां मुझे काफी परेशानी हुई। मैं खुलकर परिवार के साथ अपनी परेशानियां नहीं बांट पाती थी। हालांकि गोद लेने वाली मैं अकेली नहीं थी, पर मेरे और पेरि$जाद के बीच खास अंतर था वो वहां तब से थी जब वह 6 महीने की थी। पर मेरे मम्मी-पापा बहुत ही अच्छे हैं।

स्कूल के बाद मैंने जयहिंद कॉलेज में दाखिला ले लिया था। मुझे बहुत सारे दोस्त मिले। ज्यादातर दोस्तों को संगीत से काफी लगाव था। सो हम सब मिलकर संगीत का आनंद उठाया करते थे। मैं दोस्तों के घर या फिल्म देखने भी जाया करती थी। फिल्म देखते समय कोई एक दोस्त मुझे कहानी बताता जाता था।

देर रात तक घर से बाहर न रहने के मुझे भी कड़े निर्देश मिले थे। मैं खुश थी कि अपनी उम्र की लड़कियों के समान ही जिंदगी जी रही हूं। परीक्षा के दिनों में मेरे लिए समस्या खड़ी हो जाती थी क्योंकि मुझे पेपर पढक़र सुनाने और बाद में उसे लिखने के लिए एक व्यक्ति की आवश्यकता होती थी। कॉलेज में कई अप्रिय अनुभव भी रहे। लेकिन ये सब भी जीवन का एक हिस्सा हैं।

मैं अब अपने घर पर बड़ा सहज महसूस करती हूं। जब पापा देर से घर लौटते हैं, तो मैं मां के साथ घंटों बतियाती हूं। अपनी सूंघने की शक्ति की मदद से अब मैं खाना बनाना सीख रही हूं। मेरी यह शक्ति ज्यादा तेज है। अब ऐसा कुछ नहीं जो मैं न कर सकती होऊं। अकेले बस में आसानी से सफर कर लेती हूं। अच्छा लगता है, लोग मदद करते हैं।

जिंदगी सामान्य हो गई है। मुझे संगीत, पढ़ाई और लेखन से लगाव है और वकालत से पत्रकारिता तक सब कुछ कर लेना चाहती हूं। जो लोग काम नहीं करते हैं, उन्हें देखकर मैं स्वयं को बहुत भाग्यशाली समझती हूं। आज मैं अपने जन्म देने वाले माता-पिता को धन्यवाद देती हूं क्योंकि उनके ही कारण मुझे ऐसे माता -पिता और ऐसी जिंदगी मिली। ऐसी जिंदगी की मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी। मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मेरे पास आज सब कुछ है।

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