पुलिस के पास विवेकाधीन शक्तियाँ एवं पुलिस सुधार के लिये उपाय संबंधी निर्देश

प्रकाश सिंह के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप एवं पुलिस सुधार के लिये उपाय संबंधी निर्देश इस दिशा में लिया गया एक अभूतपूर्व कदम है। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देश के आलोक में अब तक 15 राज्यों ने पुलिस अधिनियम का गठन कर लिया है। इन पुलिस अधिनियमों के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि अधिकांश मामलों में पेशागत स्वतंत्रता, पुलिस को और अधिक अधिकार, विभिन्न अधिकारियों के निश्चित कार्यकाल, राजनैतिक दबाव से बचने के उपाय संबंधी प्रावधान बढ़चढ़ कर किए गए हैं किन्तु जनता के प्रति पुलिस की जबाबदेही स्थापित करने की प्रक्रिया संबंधी प्रावधान नगण्य हैं। लोकतांत्रिक पुलिस का लक्ष्य एवं साधन अर्थात् प्रक्रिया दोनों लोकतांत्रिक होनी चाहिए।

पुलिस सुधार के लिये उपाय संबंधी निर्देश

अतएव लोकतांत्रिक पुलिस का स्वरूप लोक-सेवा, लोक-उत्तरदायित्व और भारत के संविधान और विधि का शासन संचारित करने वाला एवं सभी व्यक्तियों के लिए सेवा, सुरक्षा और मानवधिकार सुनिश्चित करने वाला होना चाहिए। अतः मानवाधिकार संबंधी संस्थाओं एवं समीक्षकों ने प्रस्तावित पुलिस अधिनियम में सुधार कर जन उत्तरदायित्व एवं नागरिक अघिकार सुनिश्चित करने हेतु संस्थागत तंत्र की स्थापना संबंधी प्रावधान करने का सुझाव दिया है। पुलिस का कार्य प्रायः निषेधात्मक एवं नियामक है और उसका स्वाभाविक संबंध व्यक्तियों के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा से है। ये विषय मानवाधिकार के भी हैं, इसलिए यदि पुलिस के स्तर से कहीं अपराध नियंत्रण या विधि-व्यवस्था संधारण में निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन होता है तो मानवाधिकार का उल्लंघन बन जाता है। किंतु लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के किसी भी अभिकरण द्वारा मानव अधिकारों का उल्लंघन क्षम्य नहीं है। पुलिस के मामले में यह बात और भी कठोरता से लागू होती है क्योंकि पुलिस अपने काम में बिना जन समर्थन के सफलता नहीं प्राप्त कर सकती।

अतः पुलिस के द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन का एक परिणाम यह होता है कि पुलिस को जनता का सहयोग प्राप्त नहीं होता है और पुलिस अपने काम को कुशलता पूर्वक नहीं कर पाती है। लोकतंत्र में विधि का शासन निहायत मौलिक मूल्य है, जिसे किसी भी व्यक्ति द्वारा अनदेखा नहीं किया जा सकता है। व्यवहार में विधि का शासन समानता और शक्तियों के मनमाने प्रयोग के निषेध के रूप में घटित हुआ है। भारत के संविधान में विधि के शासन के तीन मौलिक तत्व हैं जो पुलिस पर भी लागू होते हंै। पहला तत्व विधि के समक्ष समानता है जिसे भारत के संविधान कीे प्रस्तावना में परिस्थिति और अवसर की समानता सुनिश्चित करने हेतु परिभाषित किया गया है तथा यह भारतीय संविधान का मूल ढाँचा है, इसे संविधान के अनुछेद 14,15,16,17 एवं 18 में विस्तारित किया गया है। दूसरा तत्व शक्तियों के मनमाने प्रयोग के विरूद्ध है, जो राज्य को पारदर्शिता, स्वच्छता एवं युक्तियुक्त ढंग से व्यवहार करने के लिए बाध्य करता है। ‘विधि का शासन‘ का तीसरा तत्व है यह कि कानून द्वारा भी भारतीय संविधान द्वारा प्रत्याभूत मूल मानवाधिकारों का न्यूनीकरण नहीं किया जा सकता है।

भारत के संविधान कीे प्रस्तावना

पुलिस के पास विस्तृत विवेकाधीन शक्तियाँ हैं जिनके कारण विधि के शासन के उपर्युक्त तत्वों के उल्लंघन की काफी संभावना बनी रहती है। इसलिए पुलिस को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाने का प्रश्न उठता है जिससे राज्य और जनता दोनों के अधिकारों का संरक्षण हो सके। पुलिस के जनता के प्रति उत्तरदायित्व का संबंध कानूनी रूप से प्रर्वतनीय नियमों से है। यदि पुलिस को जनता के प्रति उत्तरदायी बना दिया जाय तो पुलिस एक बल न होकर सेवा संगठन का रूप ले लेगी और सेवा संगठन के रूप में पुलिस जनता, कानून और संगठन के प्रति उत्तरदायी होगी। पुलिस को जनता कानून और संगठन के प्रति जिम्मेवार बनाकर हम जन-सामान्य के मौलिक एवं मानव अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित कर सकते हैं। इस दिशा में निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं यद्यपि इसके परिणाम सामने आना बाकी है किन्तु हम आशान्वित है कि न्यायपालिका के निर्देश के आलोक में जनता के सहयोग से 21वीं सदी में हम इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे।

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